राज्य सरकार बच्चों को उचित शैक्षणिक माहौल देने में विफल

बिहार में आखिर ये हो क्या रहा है? इंटर की परीक्षा में 65 फीसदी बच्चे फेल हो गये तो दसवीं की परीक्षा में तकरीबन 50 प्रतिशत हो गये अनुत्तीर्ण? मैट्रिक की परीक्षा में 17 लाख परीक्षार्थी शामिल हुए थे जिसमें आठ लाख फेल हो गये। बहरहाल, इस परीक्षा में जो बच्चे सफल हुए उन्हें शुभकामनाएं। जो असफल रहे उन्हें मायूस होने की जरूरत नहीं, उनके सामने और भी मौके आएंगे। वैसे रिजल्ट इस तरह के रिजल्ट के बाद इस प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था के बारे में क्या कहा जा सकता है? हैरत की बात तो यह है कि इस तरह के नतीजे आने के बाद भी शासन में बैठे लोगों को जरा भी शर्मिंदगी नहीं है। इंटर और मैट्रिक मिला कर 17 लाख युवाओं की तकदीर और उनके भविष्य को बिहार की शिक्षा व्यवस्था ने चौपट कर के रख दिया। शिक्षा व्यवस्था की इस सड़न की चुभन सत्ता के शीर्ष में बैठे लोगों को कोई बेचैनी नहीं हो रही। आम लोग तो खामोश हैं और बिहार में रह कर अपनी नियति को भोग रहे हैं। 

जिस तरह के परीक्षा परिणाम आ रहे हैं उसमें हर वर्ष बहुत बड़ी संख्या में हमारे युवा फेल कर रहे हैं और प्रतिस्पर्धा के इस युग में पिछड़ते जा रहे हैं। उनके आगे बढ़ने की तमाम संभावनाओं को समाप्त कर दिया गया है। सरकार के स्तर से स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने और पठन-पाठन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने की दिशा में कोई सकारात्मक पहल नहीं की जा रही है। स्कूलों में सुयोग्य शिक्षकों की बेहद कमी है। स्कूलों में प्रयोगशाला जैसे अन्य संसाधनों का अभाव है। ऐसे में बेहतर परिणाम कैसे आ सकतेे हैं भला? जब तक स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दी जाती है बिहार की मर्यादा इसी तरह खंडित होती रहेगी। सीधा सवाल मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से है कि स्कूली शिक्षा की इस ढहती मीनार को बचाने की दिशा में वे क्या कर रहे हैं? बिहार के बच्चों में मेधा की कोइ्र कमी नहीं है और वे विपरीत परिस्थितियों के बावजूद देश में बिहार का नाम रौशन कर रहे हैं मगर राज्य सरकार उन्हें उचित शैक्षणिक माहौल देने में विफल साबित हो रही है।