एक समान शिक्षा, एक समान स्वास्थ्य और एक समान सब को न्याय का सवाल

एक राष्ट्र, एक कर का नारा देने वाले एक समान शिक्षा, एक समान स्वास्थ्य और एक समान सब को न्याय को अपना लक्ष्य क्यों नहीं बनाते? यह सवाल जन अधिकार पार्टी के राष्ट्रीय संरक्षक माननीय सांसद पप्पू यादव जी ने उठाया है। आखिर प्रधानमंत्री एक समान शिक्षा को अपना लक्ष्य क्यों नहीं बनाते? सब को एक समान स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने को अपना लक्ष्य क्यों नहीं बनाते? सब को एक जैसा न्याय सुगमता और सहजता से मिले इसे क्यों नहीं अपना लक्ष्य बनाते? एक राष्ट्र, एक बाजार, एक कर सुनने में तो अच्छा लगता है, देश हित में है, इससे व्यवसाय सरल हो जायेगा, इससे पारदर्शिता आयेगी लेकिन इससे कहीं अधिक आवश्यक है एक जैसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सब को मिले, एक जैसी बेहतरीन स्वास्थ्य सेवा सब को मिले, एक जैसा सब को न्याय मिले। यह ज्यादा महत्वपूर्ण ही नहीं हरेक नागरिक के लिए आवश्यक है, यह एक क्रांतिकारी बदलाव होगा। उसका जश्न 12 बजे रात रात में संसद जा कर मनाया गया होता तो वह उल्लेखनीय बात होती। जिस दिन 125 करोड़ देशवासियों को एक समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिलेगा, बेहतरीन स्वास्थ्य सेवा मिलेगी, एक समान सहजता से न्याय उपलब्ध होगा उस दिन आधी रात को सब को बुला कर हर्षोल्लास के साथ जश्न मनाया जाए तो पूरी दुनिया में संदेश जायेगा, उस दिन भारत का एक महाशक्ति के रूप में उदय होगा।

कर व्यवस्था में परिवर्तन ऐसा कोई क्रांतिकारी, युगांतकारी मसला नहीं है जिसके लिए इतना ढोल पीटा जाए, इतना हर्षोन्माद फैलाया जाए। सच में यह विचारणीय विषय है कि देश की व्यवस्था समय≤ पर बदलती रही है। जीएसटी कोई रामबाण नहीं है, कल हो सकता है जीएसटी से बेहतर कर व्यवस्था आये और कर का सरलीकरण हो। पेट्रोल, पेट्रोलियम, बिजली, अल्कोहल को जीएसटी से बाहर रखने की पुरानी कर व्यवस्था बरकरार रखी गई है। आगे ऐसी कर व्यवस्था हो सकती है कि उन्हें भी जीएसटी के दायरे में लाया जाए, जीएसटी में कर का जो चार स्लैब है उसे भी आगे चल कर एक दायरे में लाया जाए। इसके लिए हर बार घंटी बजाने और डंका पीटने की जरूरत नहीं है। देश के लिए वह गौरव का दिन होगा, दूसरी आजादी होगी जब हरेक बच्चे को उसका बचपन वापस मिले, उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, गरीब को बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया हो, कमजोर से कमजोर व्यक्ति को सहजता के साथ सच में न्याय मिले। वैसी व्यवस्था बने तो वह दिन दूसरी आजादी का दिन होगा। वह दिन सच में जश्न मनाने का होगा। प्रधानमंत्री इसे अपना लक्ष्य बनाएं, कर व्यवस्था का जश्न तो ऐसा लगता है जैसे किसी कुपोषित, भूखे-नंगे व्यक्ति से रक्तदान करवा कर उसे जश्न मनाने को कहा जाए।